खबर : देहरादूनी बासमती: एक सुगंधित विरासत का उदय और अवसान

देहरादूनी बासमती: एक सुगंधित विरासत का उदय और अवसान
______________________
______________________

शीशपाल गुसाईं वरिष्ठ पत्रकार की कलम से

देहरादून : हिमालय की गोद में बसी वह दून घाटी, जहां की माटी और हवा में एक अनूठी मिठास और महक बस्ती है। यह वही भूमि है, जिसने विश्व-विख्यात देहरादूनी बासमती को जन्म दिया, एक ऐसा चावल जिसकी सुगंध कभी गांवों की फिजाओं को महकाती थी और जिसकी ख्याति देश-दुनिया में गूंजती थी। लेकिन यह बासमती, जो आज भी अपने नाम से पहचानी जाती है, मूलतः इस मिट्टी की नहीं थी। यह एक ऐसी कहानी है, जो इतिहास, संस्कृति, और प्रकृति के संगम से बुनी गई है—एक कहानी जो अफगानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद खान बरकजई की निर्वासन यात्रा से शुरू होती है और देहरादून के खेतों में खिलकर विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ती है। किंतु, समय के साथ शहरीकरण और आधुनिकता की आंधी ने इस सुगंधित विरासत को लगभग लुप्तप्राय कर दिया।

एक बीज की यात्रा: अफगानिस्तान से दून तक

______________________

वर्ष 1839, जब ब्रिटिश-अफगान युद्ध के उतार-चढ़ावों ने अफगानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद खान को सत्ता से बेदखल कर दिया। अंग्रेजों ने उन्हें उनके परिवार सहित निर्वासन में भेजा, और नियति ने उनकी मंजिल बनाई उत्तराखंड की मसूरी, जो देहरादून की गोद में बसी थी। मसूरी की ठंडी हवाएं और हरे-भरे पहाड़ इस शाही परिवार को तो रास आए, लेकिन दोस्त मोहम्मद का दिल अपने वतन की बिरयानी और उसकी आत्मा—बासमती चावल—के लिए तड़पता रहा। देहरादून के स्थानीय चावल उनके स्वाद को संतुष्ट न कर सके।

इतिहास गवाह है कि दोस्त मोहम्मद ने अपने शौक को जीवित रखने के लिए अफगानिस्तान से बासमती के चुनिंदा बीज मंगवाए। ये बीज, जो शायद काबुल की उपजाऊ भूमि से आए थे, देहरादून की जलोढ़ मिट्टी में बोए गए। और फिर, जैसे प्रकृति ने इस विदेशी मेहमान का स्वागत किया हो, दून की माटी, हवा और पानी ने इन बीजों को ऐसा निखारा कि जो बासमती पैदा हुई, वह पहले से कहीं अधिक सुगंधित, मधुर और स्वादिष्ट थी। जब यह चावल किसी एक घर में पकता, तो उसकी खुशबू हवा में तैरती हुई पूरे गांव को अपनी आगोश में ले लेती। यह थी देहरादूनी बासमती की शुरुआत—एक ऐसी फसल, जिसने न केवल स्थानीय किसानों के खेतों को समृद्ध किया, बल्कि दून की पहचान को विश्व भर में उभारा।

सुगंध का स्वर्ण युग: व्यापार और ख्याति
______________________

देहरादूनी बासमती की ख्याति धीरे-धीरे दून घाटी से निकलकर पूरे भारत में फैलने लगी। व्यापारी दूर-दूर से देहरादून पहुंचने लगे। खेतों में लहलहाती बासमती की फसल को देखकर उनकी आंखें चमक उठतीं। वे खड़ी फसल की बोली लगाते और धान पकने पर उसे खेतों से ही उठा ले जाते। एक समय ऐसा आया जब देहरादून के मोहकमपुर, सेलाकुई, माजरा, विकासनगर और आसपास के इलाकों में बासमती की खेती ने पूरे क्षेत्र को अपनी सुगंध से सराबोर कर दिया। यह बासमती केवल देहरादून तक सीमित न रही। हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर और नैनीताल के खेतों में भी इसकी खेती होने लगी, लेकिन इसे हमेशा “देहरादूनी बासमती” ही कहा गया। इसकी खासियत थी इसकी अनूठी सुगंध, लंबे-लंबे दाने, और पकने पर वह मिठास जो इसे अन्य चावलों से अलग करती थी। विश्व बाजार में भी इसकी मांग बढ़ने लगी। भारत, जो आज विश्व में 70% बासमती निर्यात करता है, उसकी नींव में देहरादूनी बासमती का योगदान था। यह चावल न केवल भोजन था, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर बन गया, जो दून की मिट्टी की कहानी कहता था।

शहरीकरण की मार: खेतों का कंक्रीट में रूपांतरण
______________________

किंतु, समय ने करवट ली और देहरादूनी बासमती की यह स्वर्णिम गाथा धीरे-धीरे मलिन होने लगी। देहरादून, जो कभी अपनी हरियाली और खेतों के लिए जाना जाता था, 2000 में उत्तराखंड की राजधानी बना। इस नए दर्जे के साथ शहर का तेजी से शहरीकरण हुआ। खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल उगने लगे। मोहकमपुर, सेलाकुई, और माजरा जैसे क्षेत्र, जहां कभी बासमती की लहलहाती फसलें हवा में अपनी सुगंध बिखेरती थीं, वहां अब ऊंची-ऊंची इमारतें और कॉलोनियां खड़ी हो गईं।

उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 से 2022 के बीच देहरादून में बासमती की खेती में 62% की भारी गिरावट आई। जहां 2018 में 680 किसानों ने 410.1 हेक्टेयर भूमि पर बासमती उगाई थी, वहीं 2022 में यह घटकर मात्र 157.8 हेक्टेयर रह गई। 1981 में जहां 6000 एकड़ में बासमती की खेती होती थी, वह 2019 तक सिकुड़कर केवल 11 एकड़ रह गई। यह आंकड़े न केवल खेती के ह्रास को दर्शाते हैं, बल्कि एक ऐतिहासिक विरासत के खोने की त्रासदी को भी बयां करते हैं।

हाईब्रीड किस्मों का प्रभाव: शुद्धता का संकट
______________________

शहरीकरण के साथ-साथ बासमती की शुद्धता पर भी संकट मंडराने लगा। आधुनिक कृषि तकनीकों और हाईब्रीड किस्मों के आगमन ने देहरादूनी बासमती की मौलिकता को धूमिल कर दिया। हाईब्रीड बीजों ने जहां पैदावार बढ़ाई, वहीं उस अनूठी सुगंध और स्वाद को कम कर दिया, जो देहरादूनी बासमती की पहचान थी। आज, इसकी शुद्धता की पहचान केवल प्रयोगशालाओं में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जरिए ही संभव है। यह विडंबना ही है कि जिस चावल ने विश्व को अपनी सुगंध का लोहा मनवाया, उसकी असलियत को अब मशीनों की मदद से परखना पड़ता है।

प्रकृति और संस्कृति का अनूठा संगम
______________________

देहरादूनी बासमती केवल एक फसल नहीं थी; यह प्रकृति और संस्कृति का एक अनूठा संगम थी। दून की जलोढ़ मिट्टी, हिमालय से बहने वाली शीतल जलधाराएं, और यहाँ की समशीतोष्ण जलवायु ने इस बासमती को वह गुणवत्ता दी, जो देश के अन्य हिस्सों में इसकी खेती करने पर भी हासिल न हो सकी। इसे देश के विभिन्न क्षेत्रों में बोया गया, लेकिन वह मिठास, वह महक, और वह स्वाद केवल दून की वादियों में ही पनप सका। यह बासमती दून की मिट्टी की आत्मा थी, जो दोस्त मोहम्मद के बीजों के साथ यहाँ की संस्कृति में रच-बस गई।

संरक्षण की आवश्यकता: एक पुकार
______________________

आज देहरादूनी बासमती अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। शहरीकरण और हाईब्रीड किस्मों ने इसके मूल स्वरूप को खतरे में डाल दिया है। लेकिन अभी भी कुछ क्षेत्र, जैसे केसरवाला, दूधली, और पछवादून, में पारंपरिक तरीके से बासमती की खेती हो रही है। स्थानीय किसान अब जैविक खेती की ओर रुख कर रहे हैं, ताकि इसकी शुद्धता को बचाया जा सके। सरकार और कृषि वैज्ञानिकों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। बासमती के बीज बैंकों की स्थापना, किसानों को प्रोत्साहन, और शहरीकरण पर नियंत्रण जैसे उपाय इस विरासत को पुनर्जनन दे सकते हैं।

एक सुगंध जो अभी भी बाकी है
______________________
देहरादूनी बासमती की कहानी केवल एक चावल की कहानी नहीं है; यह एक ऐसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर की गाथा है, जो प्रकृति, मानव, और इतिहास के ताने-बाने से बुनी गई है। दोस्त मोहम्मद खान के निर्वासन से शुरू हुई यह यात्रा दून की मिट्टी में खिली और विश्व भर में महकी। किंतु, आधुनिकता की दौड़ ने इस सुगंध को धूमिल कर दिया। फिर भी, दून की हवाओं में कहीं न कहीं वह महक अभी भी बाकी है, जो हमें याद दिलाती है कि यदि हम चाहें, तो इस विरासत को फिर से जीवित कर सकते हैं। देहरादूनी बासमती न केवल एक चावल है, बल्कि दून की आत्मा है—और इस आत्मा को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

संदर्भ :
दिनेश कुकरेती, प्रमुख संवाददाता, दैनिक जागरण, देहरादून
उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड
शूरवीर रावत, साहित्यकार, देहरादून
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
लोकेश ओहरी, इतिहासकार, देहरादून

चित्र में –
“याकूब खान, दोस्त मोहम्मद खान बरकजई के पोते, ने देहरादून की बासमती को बढ़ाने में योगदान दिया।”
______________________________

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *